taxable capacity,करदान समता के निर्धारक तत्वों की व्याख्या ।
taxable capacity करदान क्षमता को परिभाषित कीजिए। करदान समता के निर्धारक तत्वों की व्याख्या कीजिए।
[करयोग्य क्षमता को परिभाषित करें. कर योग्य क्षमता निर्धारित करने वाले कारकों की व्याख्या करें।]
अथवा
करदान क्षमता से आप क्या समझते हैं? किसी देश की करदान क्षमता किन-किन बातों पर निर्भर करती है ?
[करयोग्य क्षमता से आप क्या समझते हैं? वे कौन से कारक हैं जिन पर राष्ट्र की कर योग्य क्षमता निर्भर करती है?]
उत्तर-
करयोग्य क्षमता का अर्थ एवं परिभाषा
(करयोग्य क्षमता का अर्थ एवं परिभाषा)
करदान क्षमता का अध्ययन करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है, इसका आशय मनुष्य की कर देने की शक्ति होता है। एक व्यक्ति अधिक-से-अधिक कितना कर दे सकता है, यही उसकी करदान क्षमता कही जाती है, परन्तु इसकी सही और उचित परिभाषा दे सकना कठिन कार्य है इसलिए डाल्टन का कहना है, "करदान क्षमता एक सामान्य वाक्य है, taxable capacityपरन्तु धुँधला तया भ्रामक है।" फिर भी कुछ विद्वानों ने इसकी परिभाषा देने का प्रयास किया है जो इस प्रकार है-
(1) फिण्डले शिराज के अनुसार, "करदान क्षमता न्यूनतम उपभोग के ऊपर उत्पादन का कुल आधिक्य है जो उतने ही उत्पादन को प्राप्त करने के लिए चाहिए जिससे कि जीवन स्तर पूर्ववत् बना रहे।"taxable capacity
(2) सर जोशिया स्टाम्प के अनुसार, "करदान क्षमता वह आधिक्य राशि है जो एक देश का नागरिक बिना अपने जीवन को दरिद्र व दुःखद बनाये हुए तथा आर्थिक संगठन को छिन्न-भिन्न किये सार्वजनिक व्यय के लिए अंशदान के रूप में दे सकता है।"
(3) फिशर के अनुसार, "जब करदाताओं को करों का भुगतान करने के लिए बैंकों से उधार लेना पड़े तो करदान क्षमता की सीमा आ जाती है।"
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि करदान क्षमता की सीमा निश्चित करते समय कर देने से जनता को मिलने वाले कष्टों का ध्यान रखना चाहिए। एक व्यक्ति की अपनी अनिवार्यताओं को पूरा होने के बाद जो कुछ उसके पास बचे वह सब कर के रूप में दिया जा सकता है। यही उसके करदान क्षमता की अधिकतम सीमा कही जाएगी। यदि इससे अधिक कर लगाया गया तो जनता में भुखमरी फैलेगी। अतः सरकार को हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह कर उसी सीमा तक लगाये जिससे जनता को कष्ट न हो।
करदान क्षमता को निर्धारित करने वाले तत्व
(कर योग्य क्षमता निर्धारित करने वाले कारक)
किसी देश की करदान क्षमता निम्नलिखित बातों पर निर्भर करती है-
(1) जनसंख्या का आकार-यदि किसी देश में देश की राष्ट्रीय आय में वृद्धि जनसंख्या की वृद्धि की तुलना में अधिक है तो प्रति व्यक्ति आय बढ़ जाने से जनता को कर देने की क्षमता भी बढ़ जाती है, परन्तु जिस देश में राष्ट्रीय आय के अधिक होने के साथ-साथ जनसंख्या भी अधिक होती है उस देश में करदान क्षमता कम होती है।
(2) राष्ट्रीय आय का आकार-किसी देश में करदान क्षमता उस देश की राष्ट्रीय आय पर निर्भर करती है। जितनी अधिक किसी देश की राष्ट्रीय आय होगी उतनी ही अधिक करदान क्षमता होगी।
(3) धन का वितरण-देश की करदान क्षमता धन के वितरण पर भी निर्भर करती है। धन का वितरण जितना ही विषम होगा करदान क्षमता उतनी ही अधिक होगी। इसके विपरीत धन का वितरण जितना समान होगा करदान क्षमता उतनी ही कम होगी।
(4) आय की स्थिरता-आय की स्थिरता का भी करदान क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। आय के अनियमित तथा अस्विर होने पर लोगों की करवान योग्यता कम हो जाती है। इसके विपरीत जिस देश में लोगों की आय स्थिर तया नियमित होती है उस देश के लोगों की कर देने की क्षमता प्रायः अधिक होती है।
(5) लोगों का जीवन स्तर यदि देश के लोगों का जीवन स्तर (Standard of Laving) ऊँचा है तो इसका आशय है कि लोग आरामदायक या विलासितापूर्ण वस्तुओं पर अधिक व्यय कर रहे हैं। इस स्थिति में उनकी करदान क्षमता अधिक होगी और यदि आराम एवं सुविचा पर कम खर्च कर रहे हैं तो उनकी करदान क्षमता कम होगी।
(6) taxable capacity कर प्रणाली की प्रकृति-जिस देश में वैज्ञानिक ढंग से निर्मित कर प्रणाली होती है वहाँ करदान क्षमता अधिक होती है। एक अच्छी कर-व्यवस्था में प्रत्यक्ष तथा परोक्ष दोनों प्रकार के करों का उचित मात्रा में समन्वय होना चाहिए। साथ-ही-साथ इसमें करों की विविधता भी होनी चाहिए ताकि सरकार को पर्याप्त धन प्राप्त हो सके।
(7) करारोपण का उद्देश्य किसी देश की करदान क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि करों से एकत्रित धनराशि को किस प्रकार से व्यच किया जाता है। यदि राज्य राशि उत्पादक तथा कल्याणकारी कार्यों पर व्यय करती है तो लोगों की करदान क्षमता अधिक होगी।
(8) सार्वजनिक व्यय का उद्देश्य करदान क्षमता पर सार्वजनिक व्यय का भी प्रभाव पड़ता है। यदि सार्वजनिक व्यय को उत्पादन के कार्यों में व्यय किया जाता है तो इससे व्यक्त्ति की उत्पादन शक्ति में वृद्धि होती है जिससे करदेय क्षमता भी अधिक होती है। डॉ डाल्टन का कथन है कि "सरकार जनता से कर लेकर उसे समुद्र में नहीं फेंकती वरन् उसे जनता की भलाई में व्यय करती है।" (9) मुद्रा प्रसार मुद्रा प्रसार में मुद्रा का मूल्य कम हो जाता है तथा उसकी कीमत बढ़ जाती है, परन्तु लोगों की आय स्थिर रहती है जिसके कारण जनता की वास्तविक आय कम हो जाती है। प्रो. शिराज का कहना है कि "मुद्रा स्फीति का भार करारोपण जैसा ही होता है।" इस प्रकार मुद्रा प्रसार में करदान क्षमता बढ़ जाती है।
(10) करदाता की मनोवृत्ति करदाता की मनोवृत्ति का भी कर देय क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। नागरिकों में जितनी अधिक देशभक्ति, सरकार के प्रति श्रद्धा, सरकारी नीतियों का समर्थन तथा सरकार के साथ सम्पर्क होगा उतनी ही अधिक उनकी करदान क्षमता होगी। लोगों की ईमानदारी से भी करदान क्षमता प्रभावित होती है।
(11) राष्ट्रीय भावना राष्ट्रीय भावना या देश-प्रेम पर भी करदान क्षमता निर्भर करती है। यदि देश के नागरिकों में राष्ट्रीयता की भावना का समुचित विकास नहीं हो पाया है तथा वे कर की अधिक चोरी करते हैं तो इससे देश की करदेय क्षमता में कमी हो जायेगी।
(12) विदेशी आक्रमण जब देश पर कोई बाह्रा शक्ति का आक्रमण हो जाता है तो ऐसे समय में देश के लोगों में एकता आ जाती है। सभी नागरिक आपसी मतभेद व भेदभाव छोड़कर तन-मन व धन से सरकार को सहायता करने के लिए तैयार हो जाते हैं। इसलिए ऐसे समय में देशवासियों की कार्यक्षमता या कर कर देने की क्षमता बढ़ जाती है।
(13) अर्थव्यवस्था में प्रधानता यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था में कृषि की प्रधानता है तो करदान क्षमता कम होगी क्योंकि कृषि से होने वाली आय कम एवं अनिश्चित होती है जबकि दूसरी ओर एक औद्योगिक अर्थव्यवस्था में करदान क्षमता अधिक होती है क्योंकि औद्योगिक क्षेत्र से होने वाली आय कृषि की अपेक्षा अधिक एवं निश्चित होती है।
(14) taxable capacity सरकार का स्वरूप किसी देश की करदेय देने की योग्यता के निर्धारण में सरकार के स्वरूप का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है, अधिनायक तन्त्र में सरकार लोगों पर दबाव डालकर भारी मात्रा में कर वसूल कर सकती है, जबकि प्रजातन्त्रात्मक शासन प्रणाली में ऐसा सम्भव नहीं होता है अतएव प्रजातन्त्र में लोगों की रुचि के अनुसार कार्य करने से समाज की करदेय क्षमता कम हो जाती है।
(15) देश के आर्थिक विकास का स्तर आर्थिक दृष्टि से उन्नतिशील देशों के लोगों की करदान क्षमता अविकसित तथा अर्द्ध-विकसित देशों की करदान क्षमता से अधिक होती है। यही कारण है कि भारत के लोगों की तुलना में अमेरिका, ब्रिटेन, जापान के निवासियों की करदान क्षमता अधिक है।
उपर्युक्त विवेचना से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि करदान क्षमता का विचार अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं उपयोगी है। प्रत्येक देश की सरकार को कर लगाते समय नागरिकों की करदेय क्षमता पर विचार कर लेना चाहिए। ऐसा भी हो सकता है कि करदेय करने की क्षमता पर प्रभाव डालने वाले अनेक कारणों के फलस्वरूप हम इस क्षमता को न प्राप्त कर सकें। प्रो. शिराज के शब्दों में, "किसी महत्वपूर्ण केन्द्र को जाने वाली सड़क पर बहुधा बहुत से चौराहे होते हैं, दिशा-संकेत होते हैं, खतरा सूचक चिह्न होते हैं किन्तु इससे सतर्क यात्री के लिए यात्रा का मूल्य कम नहीं होता।"

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